
nature heels everyting!!

@harsh_nishad
हर्ष निषाद एक ऐसा नाम है जो तंग गलियों की खाक छानकर इंटरनेट का देसी सितारा बना है। लखनऊ के एक साधारण मिडिल-क्लास परिवार से ताल्लुक रखने वाले हर्ष ने भारत के असली 'स्ट्रीट फूड' और सड़क किनारे ठेला लगान

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i dont know what is this???
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मेरी कहानी: टूटे फोन से लेकर करोड़ों दिलों तक का सफर (Harsh's Journey) राम-राम भाई सभी को! मेरा नाम हर्ष है। हर्ष निषाद। आप में से बहुत से लोग मुझे मेरे सोशल मीडिया हैंडल्स पर चटपटे गोलगप्पे खाते हुए, किसी कचौड़ी वाले चाचा से गपशप करते हुए, या फिर किसी गुमनाम से ठेले वाले का प्रचार करते हुए देखते होंगे। वीडियो में सब कुछ बहुत मज़ेदार, रंगीन और 'भौकाल' से भरा हुआ लगता है ना? एकदम चकाचक! लेकिन कैमरे के पीछे की जो मेरी असल ज़िंदगी रही है, वो किसी मसालेदार चाट से कम नहीं रही है। बस फर्क इतना है कि इसमें शुरुआत में तीखा और कड़वा बहुत ज्यादा था, और मीठा तो जैसे नसीब के मेन्यू में था ही नहीं। आज मैं आपको अपनी वो कहानी सुनाने जा रहा हूँ जो मैंने कभी किसी 60-सेकंड की रील या 10 मिनट के व्लॉग में नहीं बताई। ये कहानी शुरू होती है लखनऊ के हमारे मोहल्ले की उन तंग और घुमावदार गलियों से, जहां सपनो का दम घुटने में ज्यादा वक्त नहीं लगता। मैं एक बहुत ही आम, सीधे-सादे मिडिल क्लास परिवार से आता हूँ। पिताजी एक छोटी सी प्राइवेट कंपनी में क्लर्क की नौकरी करते थे और मां हाउसवाइफ थीं। घर का खर्च किसी तरह महीने के आखिर तक आते-आते हांफने लगता था। पढ़ाई-लिखाई की बात करूँ तो मैं कोई आइंस्टीन या टॉपर तो था नहीं। बस किसी तरह पासिंग मार्क्स लाकर घर वालों की गालियों से बच जाता था। हमारे जैसे परिवारों में एक अलिखित नियम होता है - "बेटा, ग्रेजुएशन कर, कोई भी 10 से 5 वाली नौकरी पकड़ ले, महीने की बंधी हुई तनख्वाह घर ला और चुपचाप अपनी ज़िंदगी काट ले।" सपने देखने का हक जैसे अमीरों के लिए रिज़र्व था। लेकिन मेरे अंदर का कीड़ा कुछ और ही गुल खिलाना चाहता था। मुझे बचपन से ही बाहर घूमने, नए लोगों से बात करने और खासकर अलग-अलग तरह का खाना खाने का बहुत शौक था। जब मैं कॉलेज के अंतिम सालों में था, तब मैंने देखा कि इंटरनेट पर लोग खाने के वीडियो बना रहे हैं। बड़े-बड़े एसी रेस्टोरेंट, महंगे इटैलियन पिज़्ज़ा, फैंसी बर्गर। ये सब देखकर मुझे बड़ी कोफ्त होती थी। मुझे लगता था, "यार! असली भारत तो ये है ही नहीं। असली स्वाद तो हमारे नुक्कड़ वाले शर्मा जी के समोसे में है, पुराने चौक की चाट में है, अमीनाबाद के टुंडे कबाब में है। ये लोग वो क्यों नहीं दिखाते?" बस, यहीं से मेरे दिमाग में व्लॉगिंग (Vlogging) का वो भूत सवार हुआ जिसने मेरी रातों की नींद उड़ा दी। मैंने शुरुआत की अपने उस पुराने, घिसे हुए स्मार्टफोन से, जिसकी स्क्रीन दो जगह से बुरी तरह चटक चुकी थी और बैटरी दिन में तीन बार चार्ज मांगती थी। जब मैं पहली बार सड़क पर फोन हाथ में लेकर खुद से बात करते हुए वीडियो बना रहा था, तो लोग मुझे ऐसे घूर रहे थे जैसे मैं किसी दूसरे ग्रह का एलियन हूँ। हमारे मोहल्ले में तो बाकायदा मेरे नाम की पंचायत बैठ गई थी। नुक्कड़ पर बैठने वाले अंकलों और मोहल्ले की आंटियों के ताने आज भी मेरे कानों में गूंजते हैं। कोई कहता, "अरे निषाद जी का लड़का तो पागल हो गया है, सड़क पर चलते-चलते फोन से बातें करता है। लगता है किसी लड़की का चक्कर है या दिमाग खिसक गया है।" मेरे खुद के दोस्त मेरा मज़ाक उड़ाते थे - "लो भाई, आ गया अपने मोहल्ले का बड़ा यूट्यूबर! भाई, शाहरुख खान का इंटरव्यू कब ले रहा है?" ये सब सुनकर दिल बहुत दुखता था। कई बार रात को छत पर जाकर अकेले में रोता था। अंदर से आवाज़ आती थी कि शायद मैं ही गलत हूँ। शायद मेरी औकात यही है कि मैं भी कोई कॉल सेंटर की नौकरी पकड़ लूं और ये कैमरा-वैमरा का शौक भूल जाऊं। लेकिन फिर सोचता कि अगर मैंने आज इन तानों से डरकर हार मान ली, तो जिंदगी भर आईने में खुद से नज़रें कैसे मिला पाऊंगा? मैंने हार नहीं मानी। मैं रोज़ चिलचिलाती धूप में निकलता। 45 डिग्री की गर्मी, धूल-मिट्टी से सने कपड़े, पसीने से लथपथ चेहरा। उसी टूटे फोन से वीडियो बनाता, रात-रात भर जागकर टूटी-फूटी फ्री ऐप्स पर एडिटिंग करता और अपलोड कर देता। व्यूज कितने आते थे? वही 10 से 15। जिनमें से 5 तो मेरे खुद के होते थे और बाकी 5 मेरे दोस्तों के, जिन्हें मैं ज़बरदस्ती लिंक भेजता था। करीब एक से डेढ़ साल तक यही सूखा पड़ा रहा। कोई ग्रोथ नहीं, कोई पैसा नहीं। फिर मैंने कुछ पैसे बचाकर, कुछ अपनी मां से झूठ बोलकर मांगकर, एक सेकंड-हैंड माइक और एक सस्ता सा गिम्बल (Gimbal) खरीदा। मुझे लगा कि अब मेरी वीडियो की आवाज़ और क्वालिटी अच्छी होगी, तो लोग मुझे ज़रूर देखेंगे। लेकिन मेरी किस्मत को मेरा इम्तिहान लेना अभी और बाकी था। जिस दिन मैं वो नया गियर लेकर पहली बार शहर के एक बड़े फूड फेस्टिवल में बड़े जोश के साथ वीडियो बनाने गया, भीड़-भाड़ में किसी ने मेरे बैग पर हाथ साफ कर दिया। मेरा माइक, गिम्बल, और यहाँ तक कि मेरे बटुए के बचे-खुचे 500 रुपये... सब चोरी हो गए। वो दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे काला दिन था। मैं उस दिन सड़क किनारे डिवाइडर पर बैठकर एक छोटे बच्चे की तरह फूट-फूट कर रोया था। मुझे लगा कि भगवान भी मुझे यही इशारा दे रहा है कि 'बेटा, ये तेरे बस की बात नहीं है, अपना टाइम बर्बाद मत कर।' मैं खाली हाथ और टूटे दिल के साथ घर वापस आया। मैंने अपना फोन एक कोने में फेंका और तय कर लिया कि कल से नौकरी ढूंढना शुरू करूंगा। ये क्रिएटर बनना, ये व्लॉगिंग... सब अमीरों के चोंचले हैं। करीब एक हफ्ते तक मैं घर से बाहर नहीं निकला। डिप्रेशन जैसी हालत हो गई थी। खाना-पीना सब छूट गया था। फिर एक रात, मेरे पिताजी मेरे कमरे में आए और मेरे पास बैठे। उन्होंने आज तक कभी मेरे इस काम का सपोर्ट नहीं किया था, लेकिन उस दिन उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखकर जो कहा, उसने मेरी ज़िंदगी बदल दी। उन्होंने कहा, "देख हर्ष, मुझे नहीं पता तू उस डिब्बे (फोन) में क्या करता है। लेकिन जब तू वीडियो बनाकर घर लौटता था, तो थका होने के बावजूद तेरी आँखों में एक अलग ही चमक होती थी। जो चोरी हुआ वो तेरा सामान था, तेरा हुनर नहीं। अगर तूने आज हार मान ली, तो वो चोर सिर्फ तेरा बैग नहीं चुराएगा, वो तेरा सपना और तेरी हिम्मत भी चुरा ले जाएगा। उठ और फिर से शुरू कर।" पिताजी की उन बातों ने मेरे अंदर जैसे पेट्रोल डालकर आग लगा दी। अगली सुबह मैंने फिर से अपना वही पुराना टूटा हुआ फोन उठाया। बिना माइक के, बिना गिम्बल के। मैं सीधे अपने मोहल्ले से कुछ दूर एक चौराहे पर बैठे 'रहीम चाचा' के पास गया। रहीम चाचा पिछले 40 साल से वहां एक छोटे से ठेले पर खस्ते और छोले बेच रहे थे। उनकी उम्र 70 के पार थी, कमर झुक गई थी, हाथों में झुर्रियां पड़ गई थीं, लेकिन फिर भी वो तपती धूप में मुस्कुराते हुए लोगों को खाना खिलाते थे। उस दिन मैंने कोई फैंसी फूड रिव्यू नहीं किया। कोई स्क्रिप्ट नहीं थी। मैंने सिर्फ अपना फोन ऑन किया और रहीम चाचा के पास बैठकर उनसे उनकी ज़िंदगी के बारे में बात करने लगा। मैंने उनसे पूछा, "चाचा, इतनी उम्र में भी, इतनी कड़ी धूप में आप इतनी मेहनत कैसे कर लेते हैं? थकते नहीं हैं?" चाचा ने कैमरे में देखकर बड़ी मासूमियत और भारी आवाज़ में कहा था, "बेटा, जब घर में जवान बेटी की शादी का कर्ज माथे पर हो, और जवान बेटों ने बुढ़ापे में मुंह फेर लिया हो, तो ये तपती धूप भी छांव लगने लगती है। मैं यहाँ सिर्फ खस्ते नहीं बेचता बाबूजी, मैं इन खस्तों के साथ अपनी बेटी का भविष्य और अपनी इज़्ज़त सेकता हूँ।" उनके उन शब्दों ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। वो वीडियो मैंने बिना किसी कट, बिना किसी फैंसी ट्रांजिशन और बिना किसी बैकग्राउंड म्यूज़िक के सीधा इंटरनेट पर अपलोड कर दिया। मैं थक कर सो गया। अगली सुबह जब मेरी आँख खुली, तो मेरा फोन हैंग हो चुका था। नोटिफिकेशन्स की ऐसी बाढ़ आई थी कि फोन की स्क्रीन फ्रीज़ हो गई थी। वो वीडियो रातों-रात वायरल हो गया था। 1 लाख, 5 लाख, 20 लाख व्यूज! कमेंट्स में लोग रो रहे थे। लेकिन बात सिर्फ व्यूज की नहीं थी। उस एक वीडियो का जो ज़मीनी असर हुआ, उसने मेरी ज़िंदगी का मकसद पूरी तरह से बदल दिया। अगले दिन जब मैं रहीम चाचा के ठेले पर गया, तो वहां लोगों की लंबी लाइन लगी थी। लोग दूर-दूर से उनके खस्ते खाने और उनकी आर्थिक मदद करने आए थे। कुछ लोगों ने तो मिलकर उनका कर्ज चुकाने के लिए एक छोटा सा फंड भी इकट्ठा कर लिया था। जब रहीम चाचा ने मुझे भीड़ में देखा, तो वो रो पड़े। उन्होंने मुझे सीने से लगा लिया और कहा, "तूने इस बूढ़े की ज़िंदगी बदल दी बेटा।" उस पल, उसी सड़क पर खड़े होकर मुझे एहसास हुआ कि मेरे हाथ में जो ये टूटा हुआ फोन है, ये सिर्फ व्यूज, लाइक्स या पैसे कमाने की मशीन नहीं है। ये किसी की ज़िंदगी बदलने का, किसी की आवाज़ बनने का सबसे ताकतवर हथियार है। मेरी असली ताकत बड़े और महंगे रेस्टोरेंट का प्रचार करना नहीं, बल्कि सड़कों पर रोज़मर्रा का संघर्ष करते हुए इन असली, मेहनतकश लोगों की कहानियों को सामने लाना है। मेरी जर्नी वहीं से असल मायने में शुरू हुई। उसके बाद मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मेरे चैनल ने रॉकेट की तरह रफ्तार पकड़ ली। मैंने भारत के अलग-अलग शहरों की गलियों की खाक छानी और वहां के लोकल वेंडर्स की अनकही कहानियां दुनिया को दिखाईं। मेरी पहली बड़ी कमाई जब यूट्यूब से आई, तो मैंने उससे अपने पिताजी के लिए एक नई घड़ी और मां के लिए एक साड़ी खरीदी। वो आंटियां जो कल तक मुझे ताने मारती थीं, आज अपने रिश्तेदारों को फोन पर बड़े गर्व से बताती हैं कि "अरे वो इंटरनेट वाला हर्ष? वो तो हमारे ही मोहल्ले का लड़का है, हमारे सामने बड़ा हुआ है!" लेकिन दोस्त, एक क्रिएटर की ज़िंदगी में चुनौतियाँ कभी पूरी तरह खत्म नहीं होतीं। जब आप बड़े होने लगते हैं, आपके फॉलोवर्स लाखों में हो जाते हैं, तो बड़े प्लेटफॉर्म्स और कॉर्पोरेट स्पॉन्सरशिप्स का एक बहुत ही गंदा खेल शुरू हो जाता है। मुझे बहुत जल्द एहसास हो गया कि ये जो स्थापित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स हैं, ये असल में हम क्रिएटर्स का खून चूसते हैं। हम दिन-रात मेहनत करते हैं, हम अपनी जान लगाकर कंटेंट बनाते हैं, कम्युनिटी हम बनाते हैं, और मलाई ये टेक कंपनियां खा जाती हैं। ऐल्गोरिदम (Algorithm) के नाम पर हमें हमेशा डरा कर रखा जाता है। अगर आप एक दिन वीडियो ना डालें, तो आपकी रीच (Reach) ज़मीन पर गिरा दी जाती है। वो हमसे हमारी ही कमाई का 40-50% हिस्सा कमीशन के नाम पर छीन लेते हैं। ये एक तरह की डिजिटल गुलामी थी। यहीं पर 'vTogether' ने मेरी ज़िंदगी में एक फरिश्ते की तरह एंट्री ली। जब मुझे इस प्लेटफॉर्म के बारे में पता चला और मैंने इनके 95/5 रेवेन्यू मॉडल (जहां 95% सीधा क्रिएटर की जेब में जाता है) के बारे में सुना, तो मुझे लगा जैसे किसी ने हमें हमारी मेहनत की असली कीमत और आज़ादी दे दी हो। मैंने बिना कुछ सोचे अपनी पूरी कम्युनिटी को यहाँ शिफ्ट करने का फैसला किया। vTogether मेरे लिए सिर्फ एक ऐप नहीं है, ये हम जैसे ज़मीनी क्रिएटर्स के लिए एक 'डिजिटल घर' है। यहाँ मैं अपने तरीके से काम करता हूँ, बिना इस डर के कि कोई अदृश्य ऐल्गोरिदम मेरी मेहनत को बर्बाद कर देगा। यहाँ मैं सिर्फ वीडियो पोस्ट नहीं करता; मैं यहाँ अपने कम्युनिटी टूल्स का इस्तेमाल करके गरीब वेंडर्स के लिए डोनेशन ड्राइव चलाता हूँ। मैं अपने फैंस के साथ लाइव आकर देसी खाने की रेसिपी शेयर करता हूँ और उनसे सीधा जुड़ता हूँ। और सबसे बड़ी बात... मैं जो मेहनत करता हूँ, उसका असली हकदार मैं ही रहता हूँ। इस आर्थिक आज़ादी ने मुझे मौका दिया है कि मैं अपनी टीम बड़ी कर सकूं, बेहतर कैमरे ले सकूं और भारत के उन सुदूर गांवों तक जा सकूं जहां की कहानियां आज तक किसी ने नहीं सुनीं। आज जब मैं स्टूडियो में बैठकर पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे अपने उस टूटे हुए फोन, उन फटे हुए जूतों और उन संघर्ष के दिनों पर बहुत गर्व होता है। अगर वो दिन नहीं होते, वो बैग चोरी नहीं हुआ होता, तो शायद मैं आज यहाँ नहीं होता। मेरा सफर अभी खत्म नहीं हुआ है। अभी तो भारत की बहुत सी गलियां छाननी बाकी हैं, बहुत से ठेले वालों की आवाज़ बनना बाकी है। तो अगर आप भी ज़िंदगी में कभी हार मानने का सोचें, या आपको लगे कि आपके पास संसाधन नहीं हैं, तो मेरी एक बात हमेशा याद रखना—कभी-कभी एक टूटी हुई स्क्रीन और खाली जेब से भी दुनिया की सबसे खूबसूरत और सच्ची तस्वीर खींची जा सकती है। बस देखने का नज़रिया साफ होना चाहिए और सीने में आग होनी चाहिए। चलिए, आज के लिए इतना ज्ञान काफी है। अब मैं चलता हूँ, मुझे आज शाम को चौक वाले बिरयानी वाले भाई की कहानी शूट करनी है। मिलते हैं vTogether पर!