
nice doggy!!

@anshika
मैं अंशिका हूँ। सरकारी नौकरी की किताबों के बीच मैंने अपनी कविताओं को एक डायरी में छुपा कर रखा था। आज मैं अपनी आवाज़ से लाखों दिलों को छूती हूँ और अपने शब्दों की कीमत खुद तय करती हूँ।

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Milestones and updates
मेरी कहानी: बंद डायरी के पन्नों से लेकर डिजिटल आज़ादी तक का सफर नमस्ते। मेरा नाम अंशिका है। अगर आप मुझे सोशल मीडिया पर फॉलो करते हैं, तो आपने मुझे अक्सर अपनी लिखी हुई कविताएँ (Poetry) और कहानियाँ सुनाते हुए देखा होगा। मेरी वीडियो में कोई बहुत चमक-दमक नहीं होती, कोई बहुत महंगा बैकग्राउंड नहीं होता। बस मैं होती हूँ, मेरे शब्द होते हैं, और एक ठहराव होता है जो शायद आज की इस भागदौड़ भरी डिजिटल दुनिया में कहीं खो गया है। लेकिन स्क्रीन पर जो शांति और ठहराव आपको नज़र आता है, उसके पीछे का संघर्ष उतना ही शोर और उथल-पुथल से भरा हुआ रहा है। मेरी कहानी उत्तर प्रदेश के एक आम मध्यमवर्गीय (Middle-class) परिवार से शुरू होती है। हमारे समाज में लड़कियों के लिए सपने देखने का एक 'दायरा' तय होता है। मुझसे भी यही उम्मीद की जाती थी कि मैं ग्रेजुएशन पूरी करूँ, SSC या किसी बैंक के एग्जाम की तैयारी करूँ, एक सुरक्षित सरकारी नौकरी पाऊँ, और फिर एक 'अच्छे से घर' में मेरी शादी कर दी जाए। कला, कविता, या लेखन... ये सब शौक के तौर पर तो ठीक माने जाते थे, लेकिन करियर के तौर पर? बिल्कुल नहीं। घर वालों का सीधा सा सवाल होता था, "कविताओं से घर का राशन आता है क्या?" इसलिए, मैंने अपने अंदर की कवयित्री को हमेशा एक राज़ ही रखा। मेरे कमरे की टेबल पर दिन भर इतिहास, भूगोल और गणित की मोटी-मोटी किताबें सजी रहती थीं। मैं दिन भर प्रतियोगी परीक्षाओं (Competitive exams) की तैयारी का नाटक करती थी। लेकिन जैसे ही रात होती, घर में सन्नाटा छाता, मैं अपनी किताबों के नीचे छुपाई हुई अपनी डायरी निकालती थी। उस डायरी के पन्नों पर मैं अपनी घुटन, अपने सपने, और उन लाखों लड़कियों की अनकही बातें लिखती थी जो अपने परिवार की उम्मीदों के बोझ तले खुद को भूल चुकी थीं। मेरे लिए लिखना कोई शौक नहीं था, वह मेरे लिए सांस लेने जैसा था। अगर मैं लिखती नहीं, तो शायद मैं डिप्रेशन का शिकार हो जाती। एक दिन, ऐसे ही कुछ लिखते हुए मेरे मन में आया कि क्यों न मैं अपनी आवाज़ रिकॉर्ड करूँ? मेरे पास कोई माइक नहीं था, सिर्फ एक पुराना इयरफ़ोन था। मैंने अपने कमरे का पंखा बंद किया ताकि आवाज़ साफ आए (गर्मियों के दिन थे और पसीने से मेरी हालत खराब थी), और मैंने अपनी एक कविता फोन में रिकॉर्ड की। वह कविता एक पिता और बेटी के रिश्ते और उन दूरियों के बारे में थी जो समय के साथ आ जाती हैं। मैंने उस ऑडियो के पीछे एक सादी सी तस्वीर लगाई और उसे इंटरनेट पर एक गुमनाम पेज बनाकर अपलोड कर दिया। मुझे डर था कि अगर मेरे रिश्तेदारों ने मेरी आवाज़ पहचान ली, तो घर में हंगामा हो जाएगा। मैंने वह वीडियो अपलोड किया और सो गई। अगले दिन जब मैंने अपना वो फेक अकाउंट खोला, तो मैं हैरान रह गई। उस एक वीडियो पर हजारों व्यूज थे, और कमेंट सेक्शन में लोग अपने माता-पिता को याद करके रो रहे थे। किसी ने लिखा था, "ऐसा लग रहा है जैसे आपने मेरे दिल की बात कह दी।" उस एक पल ने मुझे एहसास दिलाया कि मेरे शब्दों में कितनी ताकत है। मेरी डायरी के पन्ने सिर्फ मेरी घुटन का कोना नहीं थे, वे लाखों लोगों के दर्द का मरहम बन सकते थे। मैंने लगातार वीडियो बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे मेरा डर खत्म हुआ और मैंने कैमरे के सामने आना शुरू किया। लोग मेरी कविताओं से जुड़ने लगे। कुछ ही महीनों में मेरे लाखों फॉलोवर्स हो गए। मैं 'वायरल' हो चुकी थी। लेकिन, असली कहानी और असली संघर्ष यहाँ से शुरू होता है। इंटरनेट पर मशहूर होना और इंटरनेट से अपना घर चलाना, इन दोनों बातों में ज़मीन-आसमान का फर्क है। जब मेरे वीडियो लाखों लोग देखने लगे, तो मुझे लगा कि शायद अब मुझे नौकरी की तैयारी करने की ज़रूरत नहीं है। अब मैं एक 'क्रिएटर' बन गई हूँ। लेकिन पुराने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स की सच्चाई बहुत भयानक थी। सबसे पहली बात, उनका ऐल्गोरिदम (Algorithm) कविता या साहित्य (Literature) जैसी कला का सम्मान नहीं करता। उन प्लैटफॉर्म्स को चाहिए कि दर्शक बस स्क्रीन स्क्रॉल करते रहें। उन्हें 15 सेकंड का ऐसा कंटेंट चाहिए जो इंसान को बांध ले। लेकिन कविता 15 सेकंड में समझ नहीं आती; कविता को महसूस करने के लिए समय चाहिए होता है, एक ठहराव चाहिए होता है। जैसे-जैसे इन प्लैटफॉर्म्स ने 'शॉर्ट वीडियो' (Short videos) को प्रमोट करना शुरू किया, मेरी लंबी और गहरी कविताओं की 'रीच' (Reach) एकदम से गिरा दी गई। मुझे ऐसा लगने लगा जैसे मैं किसी मशीन से लड़ रही हूँ। अगर मैं हर दिन वीडियो नहीं डालती, तो मेरी व्यूअरशिप ज़ीरो हो जाती। ऊपर से, मेरे कंटेंट की चोरी होने लगी। बड़े-बड़े मीम (Meme) पेजेस मेरी आवाज़ और मेरी कविताएँ चुराकर अपने पेज पर डाल देते थे, बिना मुझे क्रेडिट दिए। वो मेरे शब्दों से लाखों रुपये कमा रहे थे, और मैं यहाँ अपने फोन का रिचार्ज कराने के लिए भी संघर्ष कर रही थी। जब कमाई की बात आई, तो वह और भी बड़ा मज़ाक था। इन पारंपरिक प्लैटफॉर्म्स ने ऐड रेवेन्यू (Ad Revenue) के नाम पर मुझे जो पैसे दिए, वो ऊंट के मुँह में ज़ीरा के बराबर थे। वो मेरी मेहनत, मेरी कला, और मेरे द्वारा लाए गए दर्शकों से करोड़ों रुपये कमा रहे थे, और मुझे उसका मुश्किल से आधा या उससे भी कम हिस्सा मिल रहा था। जब मैंने ब्रांड्स (Brands) से स्पॉन्सरशिप के लिए बात की, तो उनका रवैया बहुत अपमानजनक था। वो कहते थे, "आप तो कविताएँ लिखती हैं, आपकी ऑडियंस बोरिंग है। हम आपको फैशन या लाइफस्टाइल इन्फ्लुएंसर जितने पैसे नहीं दे सकते।" मैं टूट चुकी थी। एक तरफ परिवार का ताना कि "कहा था ना इन सब में कुछ नहीं रखा, चुपचाप नौकरी की तैयारी कर," और दूसरी तरफ यह डिजिटल दुनिया जहाँ मेरी कला का सरेआम शोषण हो रहा था। मुझे लगा कि शायद मैं हार गई हूँ। मैंने अपनी डायरी वापस बंद करने का फैसला कर लिया था। और ठीक उसी वक्त, अंधेरे कमरे में रोशनी की एक किरण की तरह vTogether मेरी ज़िंदगी में आया। मैंने एक साथी क्रिएटर से vTogether के बारे में सुना था। जब मैंने पढ़ा कि यह प्लैटफॉर्म क्रिएटर्स को 95% रेवेन्यू (95/5 Revenue Split) देता है, तो मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। मैंने सोचा कि यह कैसे मुमकिन है? आज के समय में जब हर कोई आपका खून चूसने में लगा है, कोई प्लैटफॉर्म सिर्फ 5% कमीशन पर कैसे काम कर सकता है? लेकिन जब मैंने इसे गहराई से समझा, तो मुझे एहसास हुआ कि vTogether सिर्फ एक ऐप नहीं है; यह क्रिएटर्स के हक की एक 'क्रांति' (Revolution) है। मैंने अपनी पूरी पोएट्री कम्युनिटी (Poetry Community) को vTogether पर शिफ्ट कर लिया। यहाँ आते ही मेरी ज़िंदगी और मेरी कला, दोनों को एक नई सांस मिली। vTogether पर मुझे 15 सेकंड में अपनी बात खत्म करने का कोई दबाव नहीं है। मुझे किसी ऐल्गोरिदम (Algorithm) को खुश करने के लिए रोज़ रोने-धोने वाले वीडियो नहीं बनाने पड़ते। यहाँ मेरी एक बहुत ही प्यारी और समझदार कम्युनिटी है जो साहित्य की कद्र करती है। यहाँ के कम्युनिटी टूल्स (Community Tools) और रेवेन्यू मॉडल ने मुझे आर्थिक रूप से इतनी आज़ादी दी है कि अब मैं महीने में सिर्फ 4 या 5 'प्रीमियम लाइव पोएट्री सेशन्स' (Live Poetry Sessions) करती हूँ। मेरी ऑडियंस टिकट खरीद कर मुझे सुनने आती है। चूँकि vTogether सिर्फ 5% चार्ज करता है, मेरी कमाई का 95% हिस्सा सीधे मेरे बैंक अकाउंट में आता है। मुझे अब किसी भी ब्रांड के सामने स्पॉन्सरशिप के लिए हाथ नहीं फैलाने पड़ते, और ना ही मुझे उन ब्यूटी क्रीम्स का प्रचार करना पड़ता है जिन पर मैं खुद विश्वास नहीं करती। इस आर्थिक आज़ादी ने मुझे अपने परिवार की नज़रों में वो सम्मान दिलाया है, जिसके लिए मैं तरस गई थी। जिस डायरी को मैं किताबों के नीचे छुपाती थी, आज उसी डायरी की बदौलत मैंने अपने माता-पिता के लिए एक नया घर खरीदा है। अब मेरे पिता गर्व से अपने दोस्तों को बताते हैं कि "मेरी बेटी एक कवयित्री है, और वह शब्दों से दुनिया बदल रही है।" vTogether ने मुझे एक ऐसा मंच दिया जहाँ मुझे 'व्यूज की मशीन' नहीं, बल्कि एक 'कलाकार' (Artist) समझा गया। यहाँ मेरे शब्दों की चोरी नहीं होती, बल्कि उनका सम्मान होता है। उन सभी लड़कियों से और उन सभी कलाकारों से मेरा बस एक ही संदेश है, जो अपने कमरों में बैठकर चुपचाप कुछ रच रहे हैं — आपकी कला सस्ती नहीं है। अपने शब्दों को, अपनी मेहनत को उन प्लैटफॉर्म्स के हवाले मत कीजिए जो सिर्फ आपका इस्तेमाल करना जानते हैं। अपनी कीमत खुद तय कीजिए। अगर आपके पास कहने के लिए कुछ सच्चा है, तो सुनने वाले आपको ढूंढ ही लेंगे। बस आपको सही जगह पर खड़ा होना होगा।