

@Payal
डिज़ाइनर/फैशन इनफ्लुएंर


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Milestones and updates
ग्लैमर के पीछे का गणित: फास्ट फैशन और ऐल्गोरिदम से मेरी लड़ाई चलिए, फैशन इंडस्ट्री की उस कड़वी सच्चाई पर बात करते हैं जो इंस्टाग्राम के किसी भी ब्यूटी फिल्टर में छिप नहीं सकती। जब मैंने सोशल मीडिया पर अपने कपड़े और डिज़ाइन प्रमोट करना शुरू किया, तो मुझे लगा कि मेरी कारीगरी (Craftsmanship) खुद अपनी कहानी बयां करेगी। लेकिन डिजिटल दुनिया की ज़मीनी हकीकत मेरे डिज़ाइन स्टूडियो की शांति से बिल्कुल अलग और खौफनाक थी। मुझे बहुत जल्द एहसास हो गया कि पुराने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स को असल 'कला' या 'स्लो फैशन' (Slow Fashion) से कोई लेना-देना नहीं है। एक पारंपरिक ब्राइडल लहंगे पर बारीक ज़रदोज़ी और हाथ की कढ़ाई करवाने में मुझे और मेरे कारीगरों को 45 से 60 दिन का वक्त लगता है। लेकिन इन प्लैटफॉर्म्स का ऐल्गोरिदम (Algorithm) मुझसे उम्मीद करता था कि मैं हर रोज़ 15-सेकंड की 'ट्रांज़िशन रील' डालूं, जिसमें मैं चुटकी बजाकर कपड़े बदल रही हूँ। अगर मैं हर दिन ऐसा नहीं करती, तो मेरी रीच (Reach) ज़मीन पर गिरा दी जाती थी। मैं एक डिज़ाइनर थी, जिसने सालों तक फैब्रिक और कलर थ्योरी की पढ़ाई की थी। लेकिन यह डिजिटल इकोसिस्टम मुझे सिर्फ एक 'एंटरटेनर' बनने पर मजबूर कर रहा था। मुझे ट्रेंडिंग गानों पर नाचना पड़ता था ताकि लोग मेरे डिज़ाइन किए हुए कपड़े देख सकें। और सबसे बड़ा दर्द तब होता था जब मैं अपनी हफ्तों की मेहनत से कोई ओरिजिनल डिज़ाइन तैयार करती, और रातों-रात कोई बड़ी 'फास्ट फैशन' (Fast Fashion) कंपनी उसे कॉपी करके सस्ते और घटिया फैब्रिक में बाज़ार में उतार देती। मेरे डिज़ाइन्स को ये कंपनियां निगल रही थीं, और जिस प्लैटफॉर्म पर मैं वीडियो डाल रही थी, वो मेरी ही एजुकेशनल वीडियोज़ के ऐड रेवेन्यू (Ad revenue) का आधा हिस्सा खुद खा रहा था। एक युवा महिला उद्यमी (Women Entrepreneur) के लिए यह सिस्टम पूरी तरह से दमघोंटू था। मैं अपना समय, अपना ज्ञान और अपनी पूंजी लगा रही थी, लेकिन टेक कंपनियां बिना कोई सुई-धागा उठाए मेरे मुनाफे में सबसे बड़ी हिस्सेदार बन बैठी थीं। एक डिज़ाइनर के तौर पर मैं जानती हूँ कि अगर किसी ड्रेस का बेस (Foundation) और सिलाई कमज़ोर है, तो वो ड्रेस कभी नहीं टिकेगी। मेरे डिजिटल बिज़नेस का फाउंडेशन भी कमज़ोर था। मुझे एक ऐसी जगह चाहिए थी जो मेरे काम को 'सस्ते कंटेंट' की तरह नहीं, बल्कि एक असली बिज़नेस की तरह ट्रीट करे। यहीं पर मेरी बिज़नेस स्ट्रेटेजी में vTogether की एंट्री हुई। जब मैंने vTogether के 95/5 रेवेन्यू मॉडल के बारे में जाना, तो मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे बिज़नेस मॉडल की सबसे बड़ी उलझन सुलझा दी हो। एक प्लैटफॉर्म जो क्रिएटर्स से सिर्फ 5% कमीशन लेता है—यह सिर्फ एक फीचर नहीं है, यह फैशन की दुनिया में इंडिपेंडेंट बुटीक चलाने वालों के लिए एक संजीवनी है। मैंने अपना 'पायल डिज़ाइन स्टूडियो' vTogether पर पूरी तरह शिफ्ट कर लिया और ऐल्गोरिदम की उस अंधी दौड़ से खुद को हमेशा के लिए बाहर निकाल लिया। vTogether पर मुझे वायरल होने के लिए अजीबोगरीब ट्रेंड्स फॉलो करने की ज़रूरत नहीं है। यहाँ मैंने अपनी एक 'प्रीमियम फैशन कम्युनिटी' बनाई है। मैं यहाँ लाइव मास्टरक्लास (Masterclass) लेती हूँ, जहाँ मैं फैशन के छात्रों को 'पैटर्न मेकिंग', 'कलर पैलेट सिलेक्शन' और 'शून्य से अपना खुद का बुटीक कैसे शुरू करें', यह विस्तार से सिखाती हूँ। चूँकि मेरी कमाई का 95% हिस्सा सीधे मेरे पास आता है, मुझे स्पॉन्सरशिप के लिए सस्ते और खराब क्वालिटी वाले फैशन ब्रांड्स का प्रमोशन करने की कोई मजबूरी नहीं है। इस आर्थिक आज़ादी का सबसे बड़ा फायदा मेरे कारीगरों को हुआ है। अब मैं उन्हें बेहतर पैसे दे पाती हूँ और अपनी कला के साथ बिना कोई समझौता किए, बेहतरीन क्वालिटी का फैब्रिक इस्तेमाल कर पाती हूँ। फैशन सिर्फ वो नहीं है जो आप पहनकर पार्टी में जाते हैं; फैशन वो है जो आपको आज़ादी और ताकत देता है। आज मैं दिल्ली की गलियों से सिर्फ लहंगे नहीं सिल रही हूँ, मैं vTogether पर अपने जैसी हज़ारों लड़कियों के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता (Financial Independence) का रास्ता भी सिल रही हूँ। ट्रेंड्स तो हर शुक्रवार को बदलते हैं, लेकिन असली क्लास और कंट्रोल वो है जो आप खुद डिज़ाइन करते हैं। मेरा नाप बिल्कुल सही है, और मेरी उड़ान अभी बाकी है।
बचपन से ही मुझे कपड़ों और स्टाइल का बहुत शौक था। जब दूसरे बच्चे खेलते थे, तब मैं अपनी कॉपी में अलग-अलग तरह के लहंगे, गाउन और ड्रेसेस के डिज़ाइन बनाया करती थी। मेरी माँ जब किसी शादी या त्योहार के लिए तैयार होती थीं, तो मैं उनके पास बैठकर उनके कपड़ों और ज्वेलरी के कॉम्बिनेशन देखती रहती थी। तभी मुझे महसूस हुआ कि फैशन सिर्फ पहनावे तक सीमित नहीं है, यह आत्मविश्वास और व्यक्तित्व की पहचान है। दिल्ली जैसे बड़े और विविधता से भरे शहर में पली-बढ़ी होने का असर मेरे सोचने के तरीके पर पड़ा। यहाँ आपको हर तरह का फैशन देखने को मिलता है — पारंपरिक भी और मॉडर्न भी। चांदनी चौक की पारंपरिक चमक और साउथ दिल्ली की मॉडर्न स्टाइल, दोनों ने मुझे बहुत प्रेरित किया। धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा कि मैं इसी क्षेत्र में अपना भविष्य बनाना चाहती हूँ। मेरे परिवार में शुरुआत में थोड़ी चिंता थी। उन्हें लगता था कि फैशन इंडस्ट्री में करियर बनाना आसान नहीं है। लेकिन मैंने ठान लिया था कि मुझे वही करना है जो मेरे दिल को सुकून दे। मैंने फैशन डिज़ाइनिंग की पढ़ाई शुरू की। वहाँ जाकर मुझे पता चला कि डिजाइनिंग सिर्फ सुंदर कपड़े बनाने का नाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे बहुत मेहनत, तकनीक और समझ होती है — जैसे फैब्रिक की जानकारी, पैटर्न मेकिंग, स्टिचिंग, कलर थ्योरी और ट्रेंड एनालिसिस। पढ़ाई के दौरान कई बार ऐसा हुआ कि मेरे डिज़ाइन उम्मीद के मुताबिक नहीं बने। कभी सिलाई में गलती हो जाती, कभी फिटिंग सही नहीं आती। लेकिन हर गलती ने मुझे कुछ नया सिखाया। मैंने सीखा कि परफेक्शन एक दिन में नहीं आता। लगातार अभ्यास और धैर्य ही आपको बेहतर बनाते हैं। कॉलेज के बाद मैंने एक मशहूर डिजाइनर के साथ इंटर्नशिप की। वहाँ मैंने असली दुनिया की चुनौतियाँ देखीं। क्लाइंट्स की पसंद अलग-अलग होती है। कभी उन्हें सब कुछ तुरंत चाहिए होता है, कभी आखिरी समय में बदलाव। वहाँ मैंने सीखा कि एक अच्छे डिजाइनर को सिर्फ क्रिएटिव ही नहीं, बल्कि समझदार और धैर्यवान भी होना चाहिए। 24 साल की उम्र में मैंने अपनी पहली छोटी सी कलेक्शन लॉन्च की। यह कोई बड़ा फैशन शो नहीं था, बल्कि एक छोटी प्रदर्शनी थी जहाँ मैंने अपने डिज़ाइन खुद प्रस्तुत किए। मुझे आज भी याद है, जब मेरी पहली ड्रेस बिकी और ग्राहक ने मुस्कुराते हुए कहा, “यह पहनकर मैं बहुत खास महसूस कर रही हूँ।” उस पल मुझे एहसास हुआ कि मैं सही रास्ते पर हूँ। शुरुआत आसान नहीं थी। कभी ऑर्डर कम मिलते थे, कभी मुनाफा नहीं होता था। कई बार खुद पर शक भी हुआ। लेकिन मैंने हार नहीं मानी। मैंने सोशल मीडिया का सहारा लिया और अपने डिज़ाइनों को ऑनलाइन शेयर करना शुरू किया। धीरे-धीरे लोग मेरे काम को पसंद करने लगे। दुल्हनों ने अपने खास दिन के लिए मुझ पर भरोसा करना शुरू किया। यह मेरे लिए बहुत बड़ी बात थी। मेरी डिजाइनिंग का सिद्धांत बहुत सरल है — हर कपड़ा पहनने वाले के व्यक्तित्व को दर्शाना चाहिए। मैं ट्रेंड को फॉलो जरूर करती हूँ, लेकिन आंख बंद करके नहीं। मैं चाहती हूँ कि जो भी मेरा डिज़ाइन पहने, उसे लगे कि यह खास उसके लिए ही बनाया गया है। मुझे खासतौर पर ब्राइडल वियर डिजाइन करना बहुत पसंद है। एक दुल्हन का सपना उसके लहंगे में छिपा होता है। जब वह मेरे बनाए कपड़े पहनकर अपने जीवन के सबसे खास दिन पर मुस्कुराती है, तो मुझे जो संतोष मिलता है, वह शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। 28 साल की उम्र में मैंने समझ लिया है कि सफलता रातों-रात नहीं मिलती। इसके लिए लगातार मेहनत, धैर्य और खुद पर विश्वास जरूरी है। इस इंडस्ट्री में प्रतियोगिता बहुत है, लेकिन मैं खुद की तुलना किसी और से नहीं करती। मैं सिर्फ कल की पायल से बेहतर बनने की कोशिश करती हूँ। दिल्ली आज भी मुझे रोज़ प्रेरित करती है। यहाँ के बाजार, शादियों का सीजन, त्योहारों की रौनक — सब कुछ मेरी रचनात्मकता को नई दिशा देते हैं। मैं अक्सर नए फैब्रिक और डिजाइन की तलाश में मार्केट घूमने निकल जाती हूँ। प्रेरणा कभी भी, कहीं से भी मिल सकती है। मेरा सपना है कि एक दिन मेरा ब्रांड अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचाना जाए। मैं चाहती हूँ कि मेरे डिज़ाइन भारतीय संस्कृति की खूबसूरती को दुनिया तक पहुँचाएँ। और सबसे ज्यादा, मैं चाहती हूँ कि छोटे शहरों की लड़कियाँ यह विश्वास करें कि अगर जुनून सच्चा हो, तो सपने जरूर पूरे होते हैं। मैं पायल हूँ। मैं 28 साल की हूँ। मैं दिल्ली से हूँ। और मैं सिर्फ कपड़े नहीं, अपने सपनों को भी हर दिन डिजाइन कर रही हूँ।